बुद्ध धम्म का अधिक गहराई से अध्ययन करने के बाद कुछ पेचिदा, अनसुलझे रहस्य व सवाल सामने आते हैं। जिनका सही जबाब देना असंभव तो नहीं लेकिन कठिन कार्य है। तथागत बुद्ध मालुंक्यपुत्र से कहते हैं कि, संसार में उपस्थित अनेक सवालों के जवाब जानकार क्या करोगे मालुंक्यपुत्र, मैने तो दुःख, दुःख का अस्तित्व, दुःख का कारण व दुःख मुक्ति का मार्ग आर्य आष्टांगीक मार्ग को तुम्हें बताया है, जो तुम्हें निर्वाण कि ओर ले जानेवाला एकमेव मार्ग है। थेरवादी परंपरा के अनुसार संसार से मुक्ति पाने की तीन धाराएं है।
1) संम्यक संबद्ध
2) प्रत्येक बुद्ध व
3) अरहंत
उपरोक्त धाराओं में सम्यक संबद्ध बनना सबसे कठिन कार्य है। ईस प्रकार का बुद्धत्व पाने के लिए अनेक प्रकार की कठिनाई व पारमीताओं को पुरा करना पड़ता है । प्रत्येक बुद्ध अपने जीवन काल में संसार के अच्छे बुरे को त्याग कर स्वयं प्रयत्न से संबोधि की प्राप्ति कर लेते हैं। सम्यक् संबद्ध कायाकल्प, देहदंडन तप व अनेक प्रकार की कठिनाईयों को पार करके बुद्धत्व को हासिल कर लेते हैं । प्रत्येक बुद्ध भी अपार मेहनत से बुद्धत्व को प्राप्त कर लेते हैं । सम्यक् संबद्ध व प्रत्येक बुद्ध को जिस बुद्धत्व की प्राप्ति होती है उसे निब्बाण कहा जाता है । तथागत बुद्ध के शिष्य तथागत के उपदेशना नुसार विमुक्तीज्ञानदर्शन की प्राप्ति कर लेते हैं, ऐसे तथागत के शिष्य अरहंत कहलाते हैं।अर्हत्व की प्राप्ति सम्यक संबद्ध की उपदेशना नुसार होती है। बुद्धत्व की प्राप्ति करने के लिए बोधिसत्व को कायाकल्प, देहदंडन तप, दस पारमीता, उपपारमीता व शिलपालन जैसे कठिनाईयो भरे मार्गसे गुजरना पड़ता है। बाद मे बोधिसत्व मे प्रज्ञा का विकास होता है। दोनों में फर्क ईतनाही है कि, सम्यक संबद्ध स्वयं प्रयत्न से बुद्ध बनते हैं और अरहंत भगवान बुद्ध के शिष्य है। तथागत बुद्ध कहते हैं कि, गृहस्थ व्यक्ति भी अर्हत्व प्राप्त कर सकते हैं । लेकिन उन्हें अरहंत होने के लिए स्वयं सम्यक् संबद्ध की देशना की जरूरत होती है, अन्य किसी की नहीं ।
बौद्ध साहित्य में ऐसे कई उदाहरण हैं ।
अर्हत्व पद प्राप्त करने के बाद अरहंत व्यक्ति गृहस्थ जीवन नही जी सकता। क्योंकि गृहस्थ जीवन अनेक प्रकार की कठिनाई व दुःखो से भरा हुआ रहता है। गृहस्थ जीवन मे रहकर शंखलिखित शिलपालन नहीं हो सकता। अर्हत्व पद प्राप्त करने के बाद वह संघ मे संमिलित हो जाते हैं। वे समस्त संसार को उपेक्षा भाव से व करूणा भाव से देखते हैं। अब उनमें मै, मेरे का भाव टूट चुका है, अब वे संसार को तीन तरह से देखते हैं, अनित्य, अनात्म व दुखद। बोधिसत्व को पाली भाषा मे बोधिसत्त कहा जाता है। जो बोधिसत्व नहीं है वह भी बुद्ध की उपदेशना नुसार जीवन जीकर अर्हत्व पद प्राप्त कर सकता है।
थेरवादी परंपरा के अनुसार संसार मे बुद्ध कभी कभार उत्पन्न होते हैं। भगवान बुद्ध कहते हैं कि हर व्यक्ति बुद्ध बन सकता है। बुद्ध बनने की क्षमता व योग्यता हर किसी मे होती है। इसिलिए बुद्ध बनने के लिए बोधिसत्व होने की नहीं बल्कि अच्छा इंसान होने की जरूरत होती है। तत्कालीन मान्यतानुसार
बोधिसत्व उस व्यक्ति को कहा जाता है जो कभी ना कभी बुद्ध बनेगा, जिसमें बुद्ध बनने की संभावना है ।
लेकिन महायान परंपरा ने बोधिसत्वो को लोकोत्तर घोषित कर दिया है,और अनेक बोधिसत्वो को सामने लाया हैं। वे उनकी पुजा भी करने लगे हैं। लेकिन थेरवादी परंपरानुसार बोधिसत्व सर्वसामान्य मनुष्य है जो प्रयत्न कर के आगे चलकर बुद्ध बनेंगे। हर कोई व्यक्ति बुद्ध बन सकता है चाहे वह बोधिसत्व हो या ना हो। निब्बाण यह शब्द बहुत ही पेचिदा है। इस विषय को लेकर कई Theorys है कोई Practical नहीं। निब्बाण को सही तरीके से वही समझा सकता है जो खुद अरहंत या सम्यक् संबद्ध है। इस शब्द का सही उत्तर तथागत बुद्ध के संघ जो चार श्रेष्ठ पुरुष व महिलायें हैं जो श्रोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी व अरहंत है वही दे सकते हैं। कोई भी गृहस्थ निब्बाण नहीं प्राप्त कर सकता, उसे निब्बाण की प्राप्ति के लिए पहले अरहंत होना पडेगा या सम्यक संबद्ध। अरहंत और सम्यक् संबद्ध होने के बाद जब वे महापरिनिर्वाण को प्राप्त करते हैं तब उनका मनुष्य या किसी भी अन्य योनी मे पुनर्जन्म नहीं होता। ऐसा बौद्ध साहित्य में वर्णन है।
जिसने दिव्य व मानुषी चित्त मलो व बंधनों को काट दिया है, जिसने जीवन मरण के पार के सत्य का अनुभव किया है। संसार के सभी प्राणि जिसके लिए एक समान हैं। जिसका ना कोई अपना हैं ना कोई पराया है। जो बुद्ध धम्म व संघ को शरण आ चुका है। जिसनें चार चार आर्य सत्य को जान लिया है, जिसकी प्रज्ञा परिपूर्ण हैं वही भगवान बुद्ध का श्रावक अर्हत है। अर्हत लोगों को संसारीक दुखो का कारण बताकर दुख मुक्ति का मार्ग दर्शन कराते है। अरहंत भगवान बुद्ध के प्रज्ञासंपन्न शिष्य को कहते हैं जिनका बुद्ध काल में महत्वपूर्ण योगदान है। बोधी प्राप्त करने से पुर्व सिद्धार्थ गौतम को बुद्ध काल में बोधिसत्व कहा जाने का कही उल्लेख नही मिलता। ईसका उल्लेख थेरीगाथा व थेरगाथा मे भी नहीं मिलता, लेकिन यह शब्द बौद्ध साहित्य में कई जगह देखने को मिलता है। चीनी बौद्ध यात्री फा-हियान ने भारत देश मे अवलोकितेश्वर बोधिसत्व यानी भुलोक का अवलोकन करने वाले देवता की पुजा होने का जिक्र किया है। आज हिनयान व महायान बौद्ध साहित्य अनेक प्रकार के बोधिसत्वो से भरा हुआ है। महायान परंपरा की किताब Buddha told the Amitabh Sutra मे एक ही परिषद मे अनेक बोधिसत्व उपस्थित होने का उल्लेख है। उसमे बोधिसत्व मंजुश्री- धम्म के राजकुमार, अजित बोधिसत्व, गंधहस्तीन बोधिसत्व, नित्योद्युक्त बोधिसत्व, का उल्लेख आता है, और मैत्रेय, अवलोकितेश्वर, तारा, सुमेध, भैषाज्यराज, पद्मपाणी, महास्थानप्राप्त व स्थितीगर्भ इत्यादि लोकप्रिय बोधिसत्व हैं। महायान परंपरा मान्यतानुसार
बोधिसत्व बुद्ध बनने के लिए अनेक प्रकार के कठिन संकल्प करते हैं, जैसे कि, बोधिसत्व स्थितीगर्भ सम्यक संकल्प करते हैं कि, जब तक नर्क खाली नहीं हो जाते, तब तक मै बुद्धत्व को प्राप्त नहीं करूंगा। जब संसार के सभी सत्व सर्व दुखों से विमुक्त होकर निर्वाण सुख का लाभ उठायेंगे तभी मै बुद्धत्व को हासिल करुंगा। अवलोकितेश्वर बोधिसत्व को सभी सिद्धियां प्राप्त है। कहते हैं कि वे संसार के किसी भी प्राणी को दुखो से मुक्त करने के लिए किसी भी रुप में प्रकट हो सकते हैं। प्रत्येक बुद्ध यह व्यक्तित्व सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की तरह ऐतिहासिक नहीं है। बुद्ध काल में इनका कही भी उल्लेख देखने को नहीं मिलता है। लेकिन हो सकता है कि उस समय कुछ भिक्षुओं ने अन्य सांप्रदायिक सन्यासीयों से अलग रहकर संबोधि को प्राप्त किया हो जिन्हें बाद में प्रत्येक बुद्ध कहा गया हो।
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✍️ राहुल खरे नासिक
9960999363
सम्यक संबुद्ध, बोधिसत्व व प्रत्येक बुद्ध
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